गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

वैलेनटाइन डे : सेक्स वर्करों के लिए जिस्म का खेल ही प्यार

प्यार और इजहार का दिन वैलेनटाइट डेसमाज में हर ओर मोहब्बत का ही संचार करता है। बस फर्क इसे मनाने और इससे अपना जीवनचर्या को निभाने का होता है। आज भले ही समाज में ज्यादातर लोग अपने प्रेमी-प्रेमिकाओं के साथ गलबहियां करते मॉल व सिनेमा हॉल में घूम रहे हो। पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आज भी और दिन की तरह अपनी पेट की जरुरतों के लिए काम करने को ही वैलेनटाइन के तर्ज पर मना रहे हैं। इन्हीं में दिल्ली की एक अंतहीन सड़क जीबी रोड पर बसी वैश्याओं का भी हाल जिस्म बेचकर घर चलाने के अलावा कुछ और नहीं है। बल्कि अगर समाज के लोग अपने आप में खुश रहते हो तो उस दिन इनके घर का चूल्हा जलना भी दूभर होता है।

वैलेनटाइन डे की धूम के बीच जीबी रोड की सेक्स वर्कर चांदनी (काल्पनिक नाम) आज भी अपने काम को ही वैलेनटाइन के तौर पर गुजार रही है। आम लोगों की तरह उसकी सुबह भी सूरज की किरणों के साथ, नहा-धोकर संज कर घर से निकलने के रुप में ही होता है लेकिन वह किसी साथी से मिलने या पार्टी करने नहीं जाने वाली। उस सीधे जीबी रोड पर अपने ग्राहक की शारीरिक भूख को मिटाने के लिए पहुँचना है, क्योंकि भले ही आज का दिन प्रेम का हो पर तन्हा-अकेले रहने वाले लोगों को प्यार तो इस चांदनी जैसी लड़कियों से ही मिलता है। हां इससे यह सहूलियत जरुर होती है कि अकेला इंसान पैसे से प्यार पाता है और चांदनी जिस्मानी प्यार देकर कुछ पैसे।

31 साल की रुबी (काल्पनिक नाम) अपने दो बच्चों के साथ अकेले ही रहती है और दोनों बच्चों को पालने की जिम्मेदारियों के लिए उसे यही रास्ता दिखा। कम पढ़ी लिखी होने तथा पति द्वारा एक भाई को बेचे जाने के बाद उसके नसीब में इससे बेहतर काम नहीं था। जिसे काफी ना-नुकुर के बाद उसे स्वीकारना ही पड़ा। ऐसा ही कुछ हाल रुबी का भी है, जिसे छह साल की उम्र में ही किसी ने कोठे पर छोड़ दिया था। तब से कोठा ही उसकी रिहाईस और रोजगार देने वाला स्थान बन गया। अब वह हर ग्राहक को अपने प्रेमी के तौर पर देखती तथा उसमें ही अपना प्यार तलाशती है। इस तरह उसे ना तो प्यार के लिए भटकना पड़ता है और ना ही पैसों के लिए तरसना पड़ता है। रुबी कहती है कि वैसे मेरे पिता इकलौते ऐसे आदमी थे जिन्होंने बिना किसी शर्त के मुझसे प्यार किया।

प्रेम चतुर्दशी पर लोगों में उत्साह और अपने साथी के साथ डेट पर जाने का उतावलापन सामान्य ही बात है। पर यह स्वाभाविक सी बातें भी जीबी रोड की चांदनी और रुबी के साथ नहीं होती। इन दोनों के लिए प्रेम का असली मतलब पति के छोड़ के जाने के बाद घर पर बच्चों को दो जून की रोटी दिलाने का इंतजाम करना ही है। चाहे इसके बदले में उसे अपना जिस्म ही क्यों ना बेचना पड़ा है। लोगों की निगाह में भले ही जिस्मफरोशी का धंधा गलत हो लेकिन हकीकत लोगों की सोच और नजरिये से काफी अलग है। इस धंधे में कोई भी अपनी मर्जी से नहीं आना चाहता पर मजबूरियां इंसान को सब कुछ करने को राजी कर ही लेती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आम लोगों जैसी दिखने वाली चांदनी और रुबी आम लोगों की ही तरह अपना वैलेनटाइन डे क्यों नहीं मना रही। क्या उसे समाज में हर किसी की तरह खुश होने का अधिकार नहीं है या फिर उसके लिए खुश होने का तरीका और पैमाना भी अलग है। उम्मीद तो यही है कि चांदनी और रुबी इस वैलेंटाइन डे पर कोठे के मालिक को गुलाब देकर, किसी ग्राहक द्वारा उपहार लेकर तथा जीबी रोड की अन्य सेक्स वर्करों के साथ थोड़े राहत और खुशी के पल बिता कर मनाये। ताकि उन्हें भी समाज के मुख्य धारा से कटे होने का गम़ ना हो और एक आस रहे कि इन खुशियों पर उनका भी अधिकार है।

(सेक्स वर्करों से बातचीत पर आधारित....)

रविवार, 23 दिसंबर 2012

सचि$$$..न..., सचि$$$..न..., सचि$$$..न..., सचि$$$..न...

"शतकों" का "शतक", भारतीय क्रिकेट टीम का "रण-बांकुरा", क्रिकेट का "भगवान्", क्रिकेट में लम्बी दूरी तय करने में की ललक, नई उचाइयां नापने के लिए सदैव तत्पर, क्रिकेट के मैदान में मील के पत्थरों स्थापित करने में माहिर, "विवादों" में न रहने,वाला, जिसका खेल "कला" की शैली में और शालीनता "सज्जनता" की कोटी में...,प्रतीक, विशेषण, उपमा...आदि अनेक ऐसे शब्द जिस शख्स पर सबसे ज्यादा सटीक बैठते हैं उसका नाम है सचिन रमेश तेंदुलकर...।

महान शायर बशीर ने अपनी एक कविता में लिखा है कि " इतना ना चाहों उन्हें कि देवता हो जाए"। लेकिन देखते-देखते लोगों ने सचिन को इतना चाहा की वह देवता तुल्य हो गए। सचिन के जो स्ट्रोक हैं वे भारतीय क्रिकेटरों की दो पीढ़ियों के बीच सदैव पुल का काम करेंगे। तुलनाएं सिर्फ किताबी होती है और निरर्थक भी।

लेकिन आज भयावह स्थिति सामने दिख रही है जब क्रिकेट के भगवान् ने अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेट को अलविदा कह दिया है। लेकिन सचिन के सपने से एक दिन तो बाहर आना ही था। एक दिन इस बात को महसूस करना ही था कि वे तब क्या करेंगें जब क्रिकेट को अलविदा कह देंगे। क्या तब वे बच्चों, भोजन एवं कारों की दुनिया तक ही सीमित हो जाएँगे? क्या वे दुनिया की सैर करते हुए, अपने रेस्तरां के लिए रसोइयों से व्यंजनों के नुस्खे लेंगे? क्या वे अपनी फरारी चलाने के लिए समय का इस्तेमाल करेंगे? मैं नहीं जानना चाहता था दुनिया के बाकि तमाम प्रशंसकों की तरह लेकिन अब जानना तो होगा ही....

(भविष्य के लिए सचिन को ढे़रों शुभकामनाएं)

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

न्याय मिलने की चुनौतियों में किसी ने घर छोड़ा तो किसी ने शहर...

दुष्कर्म के मामलों में कानून में न्याय दिलाने को लेकर बेशक सख्त प्रावधान हैं, लेकिन उन कानूनों पर अमल नहीं हो पाता। दुष्कर्म की शिकार हुई पीड़ित युवतियां को न केवल लंबी कानून प्रक्रिया से रूबरू होकर परेशानी का सामना करना पड़ता है, बल्कि समाज में बदनामी का दंश भी उन्हें जीवन भर झेलना पड़ता है। बेशक पीड़िता मामला दर्ज कराने का साहस तो कर लेती हैं, लेकिन उसके बाद की चुनौतियों का सामना नहीं कर पातीं। इससे उन्हें अपना घर ही नहीं बल्कि शहर भी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है।

राजधानी की जिला अदालतों में ऐसे दर्जनों मामलों लंबित है, जिनमें पुलिस इस बात की जानकारी नहीं जुटा पाई है कि पीड़िताएं आखिर कहां चली गई। पिछले डेढ़ साल के दौरान इन जिला अदालतों में दुष्कर्म के लंबित 10,032 मामलों में 50 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें यह सब देखने को मिलता है। जब अदालत ने पीड़ित को बुलाया तो पता चला कि वे अपना घर छोड़कर दूसरे शहर में चली गई हैं।

कौन है जिम्मेदार....???

शनिवार, 24 नवंबर 2012

भ्रष्ट परंपराओं का निर्वाहन करती कांग्रेस


देश के पहले सियासी परिवार से जुड़ने से पहले (के दामाद बनने से पहले) मुरादाबाद में जन्में 43 वर्षीय बिजनेसमैन राबर्ट वाड्रा को स्थानीय इलाकों में भी कोई नहीं जानता था। पर ऐतिहासिक गांधी परिवार का दामाद बनने के बाद वह आम से खास हो गये। देश की सड़कों पर आम आदमी के तौर पर घूमने वाले व्यक्ति के लिए दस जनपथ से नाता होने के बाद वो सबसे चर्चित चेहरे में से एक हो गए। 10 जनपथ के दामाद बनने के बाद सत्ता पर राबर्ट का अप्रत्यक्ष रूप से असर रहा है। 

देश के मुख्य न्यायाधीश, धर्म गुरु दलाई लामा समेत कुछ गिनी चुनी हस्तियों में से एक राबर्ट वाड्रा भी जिनकी बनाना रिपब्लिक देश के एयरपोर्ट पर तलाशी नही होती। मालूम ही इनका इतना ही नही बल्कि संसद भवन में एक बार सुरक्षाकर्मी रिवाल्वर ले जाते वक्त रोका गया लेकिन मामले के दस जनपथ के दामाद से जुड़े होने के कारण कोई कानूनी फंदा नही दिया गया। जहां टाटा को सौ साल, अंबानी 50 साल में धनवान होने में लगा वहीं प्रतिभा के धनी माफ़ करियेगा प्रियंका के धनी राबर्ट वाड्रा महज दस साल में कर रहे है। लेकिन मेरा उद्देश्य राबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाने को सीधा मतलब इटैलियन झांसी की रानी सोनिया गांधी की साख पर बट्टा लगाना है। काग्रेंसी फौरन ही इसे विपक्ष की चाल करार देगें। लेकिन मैं विपक्ष का मोहरा नही हूँ, खुद को आम आदमी भी नही कह सकता नहीं तो काग्रेंसी अपनी पार्टी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर चुके केजरीवाल के दल का बताने में भी संकोच नही करेंगे। पर मै तो कहने वाला हूँ और कहने वाले तो कहेंगे ही। 

राष्ट्रमंडल खेलो के दौरान जो घपला हुआ, उसमें शामिल डीलएफ को ठेके कांग्रेसी दामाद राबर्ट के कहने पर ही दिये गये थे। राबर्ट पर आरोपो का दौर शुरू होने के बाद आरोप यह भी है कि देश में हिल्टन की चाबी राबर्ट की ही बताई जा रही है। डीएलएफ में भी वाड्रा की हिस्सेदारी बताई जा रही है। क्रिकेट में भी शाहरुख़ खान की आईपीएल की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स में उनकी हिस्सेदारी बताई जा रही है। इतना ही नहीं 2-जी घोटाले में घिरी यूनीटेक टेलीकॉम कंपनी में भी दामाद साब के 20 फ़ीसदी की हिस्सेदारी की बात सामने आयी है। राबर्ट के पास कुछ प्राइवेट प्लेन और एयरलाइंस मे भी हिस्सेदारी की चर्चा हुई थी। आजकल दूसरों के नाम पर संपति को बनाने का खेल इस भारत जैसे विकास शील देश में चल रहा है। उस देश में राष्ट्रीय दामाद की दो चार बेनामी संपति होना कोई बड़ी बात नहीं है। कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन ऐसा नहीं है सब कुछ सही हो लेकिन ऐसा नहीं है की सब कुछ गलत हो। इन सब आरोपों को दरकिनार कर सबसे बड़ी बात यह है कि आखिरकार धन आया कहां से है? एक आरटीआई के जवाब में सिर्फ अभी तक प्रश्नचिन्ह मिला है कि पिछले नौ वर्षों में राष्ट्रीय दामाद ने कितना टैक्स भरा है।  

इतिहास गवाह है कि भारत में परम्पराओं का निर्वाहन बखूबी किया जाता रहा है। उसी सिलसिले को राबर्ट वाड्रा ने आगे बढ़ाने का काम किया है। नेहरु खानदान की अनैतिकता, बेईमानी और भ्रष्टाचार की कहानी स्वतंत्र भारत में पहली बार उजागर नहीं हुई है। जवाहर लाल नेहरु के सत्ता संभालने के बाद उनके शासन काल में जीप घोटाला हुआ था। ईमानदारी की देवी कही जाने वाली इंदिरा गांधी के शासन काल में भ्रष्टाचार सर्वव्यापी हुआ। इंदिरा गांधी ने संवैधानिक संस्थाओं का कांग्रेसीकरण, अनैतिकरण किया था। परंपरा को आगे बढ़ाने का काम बोफोर्स घोटाले के समय तत्कालिक प्रधानमंत्री और नेहरु खानदान के वारिस राजीव गांधी ने तोप में दलाली खाकर किया। उनकी मौत के बाद भ्रष्टाचार की परंपरा को निभाने का बोझ उनकी पत्नी सोनिया गांधी के कंधों पर था। सोनिया ने भी परंपराओं और जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। उनपर मूर्ति तस्कर और कालेधन के आरोप चर्चित है। अब बारी राष्ट्रीय दामाद और प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा पर है जिन पर सास की सत्ता का लाभार्थी होने का आरोप लगा है।

सत्ता पर काबिज और राजनीति के शिखर पर बैठे लोग जनता की खून-पसीने की कमाई का दोहन करके अरबों की संपत्ति का काला धन जमा कर रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि राबर्ट वाड्रा सियासी परिवार को दामाद होने के कारण गैर कानूनी तरीके को भी अपराधिक प्रवृत्ति को स्वीकार नहीं कर अपने आपको ईमानदार होने का ढ़ींढ़ोरा पीट रहे हैं। कांग्रेसी नेतृत्व वाली यूपीए-दो सरकार के सभी शीर्ष मंत्री राबर्ट वाड्रा के बचाव में उतरकर उनका बचाव करते हैं। बचाव में उतरे लोग सीधे तौर पर राबर्ट का बचाव कुतर्कों के आधार पर करते हैं और देश की इटैलियन बहु कि अप्रत्यक्ष रुप से चाटूकारिता करते नज़र आते हैं। सत्तापक्ष में काबिज किसी भी मंत्री-नेता पर भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप लगता है फौरन कुतर्कों की ढ़ाल बनाकर उनका बचाव करने के लिए सरकार में शामिल कांग्रेसी कुनबे को सभी लोग तैयार रहते हैं। यूपीए-एक व दो की सरकार में हुए घोटालों को ऊपर बताये गये माध्यम (कुतर्क की ढ़ाल) से दबाने की राजनीतिक प्रक्रिया चल रही है। 2-जी हो या राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, देवास घोटाला या फिर कोयला घोटाले के बाद तो हद ही हो गयी जब विकलांगों के लिए दिये जाने वाले भारत सरकार के पैसे को हड़पने का आरोप केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद पर लगे हैं। 

इतना कुछ होने के बाद भी कांग्रेसी इन सभी आरोपियों को ईमानदारी के प्रमाण पत्र जारी कर रहे हैं, तो वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी खुद पर लगे आरोपों के जवाब में भी केवल जुमले का ही सहारा ले रहे हैं। न्यूयार्क टाइम्स में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर रिपोर्ट लिखते समय उस चुटकुले का भी जिक्र किया, जिसमें दांत के डाक्टर के पास जाकर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुंह नहीं खोलते हैं। आरोप लगने के बाद जिस तरह से कांग्रेसियों ने कुतर्कों का ढ़ाल बनाकर राबर्ट वाड्रा को बचाने का काम किया है वह इस बात का संकेत है कि सत्ता में बैठे लोग राजनीतिक साख को बचाने के लिए सत्ता की ताकत का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन सत्ता की ताकत के बावजूद राजनीतिक साख पर जनता कैसे बट्टा लगा सकती है यह हेमवती नंदन बहुगुणा के पौत्र साकेत बहुगुणा को मिली चुनावी हार से समझा जा सकता है। 

कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी में नैतिकता और ईमानदारी होती तो वह किसी भी परिस्थिति में अपने दामाद का बचाव नहीं करती। ऐसे में यह कैसे स्वीकार कर लिया जाये की सोनिया गांधी का परिवार ईमानदार है। गांधी परिवार राबर्ट वाड्रा परलगे आरोपों की स्वतंत्र जांच से क्यों परहेज कर रहा है। इस बात का जवाब देश की जनता अपने मतों को प्रयोग कर करेंगी और बीते 50 वर्षों को कांग्रेसी अत्याचारों को अंत होगा। 


मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

धन्य है कांग्रेसी कुनबा और भारत का लोकतन्त्र....

किसी भी विकसित लोकतंत्र में कांग्रेस सरकार के मंत्रियों को लेकर आये खुलासों का परिणाम बड़ी संख्या में इस्तीफों और राजनैतिक जीवन के संन्यास के रूप में होना चाहिए। मगर यह विडंबना ही है कि भारत जैसे "बनाना रिपब्लिक" (जैसा कि राबर्ट वाड्रा ने कहा था) में देश के प्रथम सियासी परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा खुद पर आरोप लगाने वालों का ही उपहास उड़ाते दिखाई देते हैं। राजनीतिक हकीकत में वाड्रा को तो कांग्रेस में प्राथमिक सदस्यता भी हासिल नहीं है, फिर भी सोनिया से लेकर पूरा कांग्रेसी कुनबा राष्ट्रीय दामाद की रक्षा में लगा हुआ है।

तो वहीं सलमान खुर्शीद के विकलांगों के नाम पर नये झोल पर कांग्रेस महासचिव ‘रेडी टू बार्क’ दिग्गी राजा व अन्य शीर्ष कैबिनेट मंत्री तक उन्हें भलाई का प्रमाण पत्र देने की जुगत में लग गये हैं। और तो और प्रधानमंत्री भी खुद पर लगे आरोपों के जवाब में जुमला का ही सहारा लिया और कहा था ‘हजार सवालों से अच्छी तो मेरी खामोशी है।’

बयानबाजी के मामले में पहले से ही तीसमार खां की पदवी हथियाने वाले कांग्रेसियों के खाते में एक और नाम जुड़ गया है। इस बार केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने भी अपने मुखारबिन्दु से खुर्शीद की तारीफ की है। उन्होंने सच सामने को रखते हुए बता दिया कि खुर्शीद अगर चोरी करते तो घोटाला 71 करोड़ का होता ना कि 71 लाख का। मतलब कि वो दबी जुबान में कैग रिपोर्ट पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनके छुपे रहस्यों वाले बयान के अनुसार, विकलांग कोटे का घपला करोड़ो में होगा, सरकार अपने रसुख के बल पर इसे दबाते हुए लाखों के स्तर पर ले आयी है।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

रण-बांकुरा सचिन

सचिन के बारे में कुछ कहने में जो शब्द इस्तेमाल किये जाते है वो शब्द अब खुद को सम्मानित महसूस करते है। अब सिर्फ यह तय करना है कि सचिन क्रिकेट को ज्यादा चाहतें हैं या क्रिकेट प्रेमी सचिन को। "शतको" का "शतक" जिसकी पहचान बन गयी है। सचिन रमेश तेंदुलकर क्रिकेट जगत का भगवान, अब तक क्रिकेट के महासंग्राम में पांच बार भारतीय क्रिकेट टीम का रण-बांकुरा, महासंग्राम को सपने में जीतने के सपने को पिछले साल खुली आँखों से देखकर पूरा कर चुका क्रिकेट का भगवान्। सचिन का अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का सफ़र 23 वर्षों से भी अधिक का रहा है। इन तेईस वर्षों में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा सचिन ने। क्रिकेट में उन्होंने लम्बी दूरियाँ तय की, नई उचाइयां नापीं और कई कीर्तिमान मील के पत्थर के तरह स्थापित किये। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण एवं बड़ी बात जो उनकी महानता को एक नई मजबूती प्रदान करती है कि वो कभी भी "विवादों" में नहीं रहे। उनका खेल "कला" कि शैली में आता है और शालीनता "सज्जनता" की कोटी में। सचिन ने ऐसे रिकार्ड स्थापित किये है जिन्हें तोड़ पाना मुश्किल ही नामुमकिन है। बीस साल, "शतको" का "शतक", और साथ में अनगिनत रिकार्ड।
आज सचिन सिर्फ नाम ही नहीं है। प्रतीक, विशेषण, उपमा आदि अनेक ऐसे शब्द सबसे सटीक जिस व्यक्ति पर बैठती है उसका नाम है सचिन तेंदुलकर। मानव स्वभाव की वजह से अधिकतर देखा जाता है कि थोड़ी बहुत सफलता मिलने के बाद लोगों के पाँव ज़मीन पर नहीं टिकते, लेकिन तमाम विश्वस्तरीय उपलब्धियों को हासिल करने के बाद भी उनके आचार-व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैं चाहूँगा तब तक सचिन अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलें जब तक यह खेल खेला जायें। इसका कारण उनका खेल के प्रति लगाव और सम्पूर्ण भावना के प्रति मेरा विश्वास अपने जीवन के 39 वसंत पार कर चुके सचिन को आज भी क्रिकेट खेलने में मज़ा आ रहा है। सचिन लगातार आक्रामक खेल रहे है और उनके इस तरह से खेलने के कारण उनके संन्यास लेने के कयास दिन-प्रतिदिन धूमिल होते जा रहे है।
सचमुच सचिन के जो स्ट्रोक है वे भारतीय क्रिकेटरों को दो पीढ़ियों के बीच पुल का काम करते है । एक वह पीढ़ी जो स्वभाविक इच्छा को दबाकर समय के अनुसार परंपरागत क्रिकेट खेलती थी और दूसरी वह जो इस तरह से बल्लेबाजी करती है की कल कुछ होने वाला है। सचिन के लिए आप कह सकते है कि वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर है। आप इससे अधिक और नहीं कह सकते, क्योंकि तुलनाएं सिर्फ किताबी होती है और निरर्थक भी।
महान शायर बशीर ने अपनी एक कविता में लिखा है कि " इतना ना चाहों उन्हें कि देवता हो जाए"। लेकिन देखते - देखते लोगों ने सचिन को इतना चाहा की वह देवता तुल्य हो गए। अपने 23 वर्षों के लम्बे करियर के बाद भी सचिन की कलात्मकता में कोई कमी नहीं आई है।सचिन को 'सदाबहार' का दर्जा, 'मास्टर-ब्लास्टर' का दर्जा या ऐसे कई नाम ऐसे ही नहीं मिले, वर्षों की मेहनत और लगन के बाद वह इस मुकाम पर पहुचे है। सचिन आज रनों के एवरेस्ट पर बैठे है। उनके खाते में टेस्ट एवं वनडे मिलाकर लगभग 34000 रन है । लेकिन सिर्फ रनों का अम्बार ही सचिन को महान लोगो की श्रेणी में प्रथम पर नहीं लाता व्यक्तित्व उन्हें महान बनाता है। सचिन में आज भी वैसी ही सादगी ,शालीनता एवं सीखने की ललक दिखाई पड़ती है, जैसी 1989 में टेस्ट खेलते समय दिखाई दी थी।
लेकिन सबसे भयावह स्थिति तब सामने दिखती है जब उनके क्रिकेट को अलविदा कहने का ख्याल भी मन में आता है। लेकिन सचिन के सपने से बाहर आने के बाद महसूस होता है कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब वे क्रिकेट को अलविदा कह देंगे। क्या तब वे बच्चों, भोजन एवं करों की दुनिया तक ही सीमित हो जाएँगे? क्या वे दुनिया की सैर करते हुए, अपने रेस्तरां के लिए रसोइयों से व्यंजनों के नुस्खे लेंगे? क्या उनके पास अपनी फरारी चलाने के लिए समय होगा? मैं नहीं जानता और दुनिया के बाकि तमाम प्रशंसकों की तरह जानना भी नहीं चाहता।
लेकिन सचिन को उनके जन्म दिन की ढेरो शुभकामनाएं.........

"लेखक सचिन का नहीं सचिन के खेल का प्रशंसक है"